त्रिवेणी संघ दे सकता है बिहार में फंसी सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा

(बिहार की राजधानी पटना में 14 जून को एक बड़ा जुटान होने जा रहा है। त्रिवेणी संघ की स्थापना दिवस के मौके पर होने वाला यह कार्यक्रम न केवल सामाजिक न्याय बल्कि वर्गीय राजनीति के लिहाज से भी बेहद खास है। एक ऐसे समय में जबकि सामाजिक न्याय की राजनीति का चक्का फंस गया है और वर्गीय राजनीति भी अपने ढलान पर है। न कोई वर्गीय संघर्ष चल रहा है और न ही उसकी अगुवाई करने के लिए कोई तैयार है। दूसरी तरफ सामाजिक न्याय का एक हिस्सा जो अभी तक सत्ता में रहते हुए नेतृत्वकारी भूमिका में था उसने फासीवादी ताकतों के सामने समर्पण कर दिया है। वर्षों से हाशिये पर रहीं फासीवादी ताकतें अब सत्ता के केंद्र में आ गयी हैं। ऐसे में वर्गीय और सामाजिक न्याय की ताकतें मिलकर कैसे इनका मुकाबला करें यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। इसी सिलसिले में यह सभा होने जा रही है। इस मौके पर आयोजकों की तरफ से एक पर्चा निकाला गया है। पेश है पूरा पर्चा-संपादक)

साथियों,

हमारे मुल्क को उल्टी दिशा में ले जाया जा रहा है। संविधान व लोकतंत्र पर हमला तेज है,आजादी को गिरवी रखा जा रहा है। ब्रिटिश हुकूमत से आजादी और सामाजिक बदलाव के संघर्षों से हासिल संविधान के साथ हमने आजाद मुल्क के बतौर यात्रा शुरु की।आज हमारी हुकूमत अमेरिका के सामने सरेंडर है।संविधान को तोड़-मरोड़ कर मनुविधान थोपा जा रहा है।मनुवादी शक्तियों के जारी विशेषाधिकारों के साथ उसका वर्चस्व नई ऊंचाई छू रहा है।मुल्क की संपत्ति-संसाधनों को अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेटों के हवाले किया जा रहा है। SIR के नाम पर बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार-वोट के अधिकार को भी छीना जा रहा है।लोकतांत्रिक अधिकारों व आवाजों को कुचला जा रहा है। लोकतंत्र को ठिकाने लगाते हुए फासीवादी तानाशाही को स्थायित्व दिया जा रहा है।

हमारे राज्य बिहार को भी 1990 के पीछे के दौर में धकेला जा रहा है।लंबे संघर्षों के बाद बिहारी समाज और राजनीति में 1990 में एक निर्णायक बदलाव आया था।बिहार की राजनीतिक सत्ता से मनुवादी शक्तियां बेदखल कर दी गयी थीं। अब एक पिछड़े को मुखौटा बनाकर भाजपा की अगुआई में मनुवादी शक्तियों ने फिर से बिहार की सत्ता में वापसी की है।खासतौर पर हिंदी पट्टी में बिहार सामाजिक न्याय व लोकतंत्र के संघर्षों की अग्रिम चौकी के बतौर रहा है।अब इस चौकी पर भी भाजपा का नियंत्रण मजबूत हुआ है।बिहार को सामाजिक न्याय व लोकतंत्र की कब्रगाह और कॉरपोरेट लूट के अड्डे में तब्दील करने का एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा है।

अब जब इतिहास का चक्का पीछे की ओर घुमाया जा रहा है तो बिहार के परिवर्तनकारी संघर्षों के इतिहास पर नजर डालना बेहद जरूरी हो जाता है।मुल्क और बिहार के सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक परिदृश्य में खड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने और आगे बढ़ने की जद्दोजहद में इतिहास से गुजरते हुए हमें अपनी जड़ों की शिनाख्त करना और उससे ताकत लेना है।विरासत को जानने-समझने के साथ उसे आगे बढ़ाना है।आखिर हम पीछे की ओर क्यों लौट रहे हैं?इस दौर में हमारी संघर्ष की विरासत हमसे क्या कह रही है?इन सवालों का जवाब भी तलाशने के लिए यह जरूरी है।

आधुनिक बिहार की परिवर्तन की यात्रा में 1990 में सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आए मोड़ से पीछे की ओर लौटते हैं तो हम त्रिवेणी संघ के संघर्ष के इतिहास तक पहुंचते हैं।बिहार में त्रिवेणी संघ का गठन 30 मई,1933 को उस समय के शाहाबाद जिले(वर्तमान में रोहतास जिला) के करगहर में हुआ था।इससे पहले अलग-अलग जाति संगठनों की सक्रियता थी।त्रिवेणी संघ ने उत्पीड़ित जातियों के साझा मंच-पहले वर्ग संगठन के बतौर बिहार में स्पष्ट व व्यापक दृष्टि और एजेंडा के साथ सामाजिक न्याय को केन्द्र में रखते हुए परिवर्तन की लड़ाई की संगठित बुनियाद रखी थी।सामाजिक-राजनीतिक जीवन में खासतौर पर पिछड़ों के संगठित दावेदारी को पहली बार बुलंद किया था।वास्तविक खेतिहर समुदायों,व्यवसायियों और मजदूरों को संगठित करने पर त्रिवेणी संघ का जोर था।

लंबे संघर्षों के बाद 1990 के दशक में आए मंडल-बहुजन उभार के केन्द्र यूपी-बिहार में भाजपा उत्पीड़ित जातियों की एकजुटता और वर्ग चेतना-वर्ग बोध को नष्ट व खंडित करते हुए हिंदू पहचान उभारते हुए ही आगे बढ़ी है।मनुवादी शक्तियां वर्ग चेतना के विकास की संभावना को लंबे समय के लिए रोक देने की लगातार साज़िश व कोशिश कर रही हैं।मौजूदा परिदृश्य में हमारे लिए त्रिवेणी संघ का संदेश स्पष्ट है-उत्पीड़ित जातियों को वर्ग के बतौर खड़ा करना,जिसकी धुरी मेहनतकश हों और संघर्ष के केन्द्र में सामाजिक न्याय के साथ मेहनतकशों के सवाल हों।

त्रिवेणी संघ के खिलाफ मनुवादी शक्तियों द्वारा यह दुष्प्रचार किया गया था कि यह तीन जातियों–यादव, कुशवाहा और कुर्मी–का संगठन है।यह दुष्प्रचार आज भी कायम है। बड़े पैमाने पर उत्पीड़ित जाति-समूह भी इसे तीन जातियों के गठजोड़ के पर्याय के बतौर ही देखते हैं।इसके मकसद को इन जातियों में पैदा हुए किसी के सत्ता के शीर्ष में जगह बनाने के मकसद तक सीमित मान लिया गया है।हमारी विरासत का विकृतीकरण हमारे खिलाफ और मनुवादी शक्तियों के पक्ष में जाता है।विकृत इतिहास बोध के साथ आज की चुनौतियों का मुकाबला नहीं कर सकते।

ज़रूर ही त्रिवेणी संघ के गठन के केंद्र में तीन प्रमुख पिछड़ी जातियों के लोग थे।लेकिन यह तमाम उत्पीड़ित जातियों के साझा मंच-वर्ग संगठन के बतौर ही आगे बढ़ा।त्रिवेणी संघ ने 90 प्रतिशत अनुन्नत जनता की बात की और उसे बैकवर्ड कहा। त्रिवेणी संघ धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक साम्राज्यवाद का अंत चाहता था।कुल मिलाकर त्रिवेणी संघ ने तमाम किस्म के अन्याय-गैरबराबरी के खिलाफ उत्पीड़ितों के आत्मसम्मान और नागरिक अधिकारों की दावेदारी किया था और राष्ट्र निर्माण की दृष्टि और सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक न्याय के व्यापक एजेंडा को प्रस्तुत किया था।

साथियों, आजादी की लड़ाई की मुख्य धारा में अंग्रेजों से राज हासिल करने का सवाल था, लेकिन 90प्रतिशत  के लिए सदियों से चली आ रही गुलामी से आजादी का सवाल भी महत्वपूर्ण था।त्रिवेणी संघ भी बाहरी और भीतरी दोनों सरकारों के खिलाफ था।त्रिवेणी संघ के घोषणापत्र ‘बिगुल’ में उल्लेखित है कि “त्रिवेणी संघ किसी भी सरकार को,जो बुरी हो,दूर करना चाहता है,बल्कि वह भीतरी सरकार की जड़ को भी उखाड़ देना चाहता है।

यही भीतरी सरकार जमींदार, पूंजीपति और अपने को ऊंचा तथा दूसरों को छोटा समझने वाले अभिमानियों से बनी हुई है,जो गरीबों और अनुन्नत समाज के लिए विदेशी सरकार से भी अधिक खतरनाक है।” त्रिवेणी संघ जमींदारों के खिलाफ असली किसानों और पूंजीपतियों के खिलाफ मजदूरों के पक्ष में था।त्रिवेणी संघ का साफ मानना था– जमीन अपने हाथ से हल चलानेवाले किसानों की है।त्रिवेणी संघ ने मजदूरों को मुनाफे के अनुसार मजदूरी,मजदूरों की सर्विस का ख्याल करने के साथ प्रोविडेंड फंड या पेंशन की व्यवस्था,वेतन की असमानता और बेकारी के सवालों पर गौर किया था।

मोदी राज में एक तरफ जीवन के तमाम क्षेत्रों में मनुवादी शक्तियों का वर्चस्व बढ़ रहा है।उत्पीड़ित जाति-समूहों द्वारा हासिल सम्मान व हक-हिस्से को फिर से छीना जा रहा है।वहीं, देश की संपत्ति-संसाधनों पर मुट्ठी भर कॉरपोरेटों का कब्जा हो रहा है।उत्पीड़ित जाति समूहों की संपत्ति-संसाधनों से बेदखली बढ़ रही है।मजदूरों पर नये सिरे से गुलामी का शिकंजा कसने के लिए चार श्रम कोड थोप दिया गया है। बेरोजगारी चरम पर है। किसानों-मजदूरों व छोटे व्यवसायियों पर कहर बरप रहा है।

बिहार में भी भूमिहीन गरीबों के घरों-झोपड़ियों पर बुल्डोजर चल रहा है तो दूसरी तरफ, कॉरपोरेटों के लूट का एजेंडा आगे बढ़ रहा है।भागलपुर के पीरपैंती में रोजगार व पर्यावरण के विनाश की कीमत पर अडानी को 1050एकड़ जमीन गिफ्ट कर दिया गया है।इस परिदृश्य में त्रिवेणी संघ की विरासत आह्वान करती है कि मनुवादी शक्तियों के विशेषाधिकार व बढ़ते वर्चस्व को तोड़ने और कॉरपोरेटों के लूट को रोकने के लिए लड़ें और सम्मान, जीवन के हरेक क्षेत्र में हरेक स्तर पर हिस्सेदारी, गरिमापूर्ण जीवन के हक-अधिकार व बराबरी के लिए आगे बढ़ें।

हम देख रहे हैं कि जाति आधारित हिंसा-उत्पीड़न व भेदभाव बढ़ रहा है तो सांप्रदायिक हिंसा व तनाव भी पैदा किया जा रहा है।धर्म के नाम पर अंधविश्वास-पाखंड व उन्माद को बढ़ाया जा रहा है।त्रिवेणी संघ जन्म आधारित ऊंच-नीच के खिलाफ था और जाति का खात्मा चाहता था। अछूत जैसे शब्द को मिटा देना चाहता था।त्रिवेणी संघ धर्म के नाम पर चलने वाले धांधलियों,लूट,अन्याय,अत्याचार,अंधेरगर्दी और स्वार्थों का अंत कर देना चाहता था।वह हिंदू-मुसलमान के बीच झगड़े को दोनों ही पक्षों के गरीबों के खिलाफ देखता था और इसके लिए पंडित और मौलवी को निशाने पर लेते हुए प्रेम-भाईचारे के पक्ष में था।त्रिवेणी संघ की विरासत आज के परिदृश्य में सेकुलरिज्म के परचम को बुलंद करने की मांग करता है।अंतिम तौर पर त्रिवेणी संघ की विरासत हमसे नये समाज, नये बिहार और नये भारत के निर्माण के संघर्ष का आह्वान करता है।

साथियों, बिहार में त्रिवेणी संघ ने उत्पीड़ित समूहों की ओर से परिवर्तन की लड़ाई की संगठित बुनियाद रखने का काम किया था और आगे का रास्ता खोला था।त्रिवेणी संघ की निरंतरता में ही जगदेव प्रसाद का संघर्ष है तो दूसरी तरफ,त्रिवेणी संघ की अधूरी लड़ाई को ही आगे बढ़ाने के लिए जगदीश महतो, रामेश्वर अहीर और रामनरेश राम की अगुआई में भोजपुर के ‘सहार’ से सबसे हाशिए के छोर से लड़ाई आगे बढ़ी।

बिहार में समाजवादियों के संघर्ष की दृष्टि व एजेंडा पर भी त्रिवेणी संघ ने गहरा असर डाला।त्रिवेणी संघ और आगे के परिवर्तनकारी संघर्षों ने बिहारी समाज व राजनीति को बदलने का काम किया, बिहार को सामाजिक न्याय व लोकतंत्र के संघर्ष की अग्रिम चौकी के बतौर खड़ा किया।राष्ट्रीय संदर्भ और बिहार के संदर्भ में खड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने और आगे बढ़ने के लिए जरूरी है कि फिर से बिहार की परिवर्तनकारी विरासत को बुलंद करें। आइए,14 जून को पटना के जगजीवन राम शोध संस्थान में दिन के 11 बजे जुटते हैं।’आज की चुनौतियों और त्रिवेणी संघ की विरासत’ पर चर्चा करते हैं और आगे का रास्ता तलाशने की जद्दोजहद में साथ चलते हैं।

(कार्यक्रम के आयोजक रिंकू यादव की ओर से जारी।)

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